एकनाथजी

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यह कृति विवेकानन्द केन्द्र के संस्थापक, माननीय श्री एकनाथजी रानडे के चरणों में उनकी २९ वीं पुण्यतिथि पर केन्द्र के एक वरिष्ठ जीवनव्रती कार्यकार्ता द्वारा, उनके चरणों में किया गया नम्र निवेदन है। लम्बे समय से श्री एकनाथी की जीवनी की आवश्यकता का अनुभव किया जा रहा था। यह आवश्यकता, केवल केन्द्र - कार्यकार्ताओं और शुभचिंनकों द्वारा ही अनुभव नहीं की जा रही थी, अपितु उन्हें व्यक्तिगत रुप से जाननेवाले व विवेकानन्द शिला स्मारक तथा केन्द्र - कार्य के माध्यम से संपर्क में आए उनके प्रशंसकों की भी यही इच्छा थी। हम यह दावा नहीं करते कि यह श्री एकनाथजी की समग्र जीवनी हेतु एक अनुकूल प्रस्तावना व सुयोग्य परिचय सिद्ध होगी, जो यथासमय अधिक योग्य हाथों द्वारा पूर्ण होगी। श्री एकनाथजी जैसे व्यक्तित्व की जीवनी लिखना कोई सरल कार्य नहीं है। महापुरुष कई प्रकार के होते हैं। आध्यात्मिक व्यक्ति अपनी आंतरिक उपलब्धियों के कारण महान् बनते हैं, जो बाह्य रुप से दिखाई नहीं देती। दूसरी ओर कुछ व्यक्ति उनके सार्वजनिक व प्रत्यक्ष योगदानों के कारण प्रसिध्दि पाते हैं। ऐसे व्यक्तियों का चरित्र लिखना, अत्यंत सरल है जिनकी उपलब्धियाँ भौतिक रुप से मापी जा सकती है, परन्तु वे व्यक्ति जिनकी आध्यात्मिक ऊँचाई कदाचित् ही दिखाई देती है, उनकी जीवनी कको शब्दबध्द करना कठिन कार्य है। श्री एकनाथजी आंतरिक एवं बाह्य दोनों स्तरों पर श्रेष्ठ थे। श्री एकनाथजी के समग्र जीवन-चरित्र का लेखन कदाचित् केवल समूह द्वारा ही संभव होगा। ऐसे महान् व्यक्ति के जीवन-चरित्र के साथ न्याय करना साधरण कार्य नहीं है। यह कार्य उचित समय पर होगा। हमें विश्वास है कि यह परमेश्वर की इच्छा है और यह निश्चित ही पूर्ण होगी। कन्याकुमारी की शिला पर लाखों लोग, एकनाथजी द्वारा पूर्ण किए गए चिरस्मरणीय कार्य को देखने के लिए आते हैं। उनके द्वारा पोषित किया गया विवेकानन्द केन्द्र, यह संगठन भी लोगों द्वारा देखा व प्रोत्साहित किया जाता है। किन्तु इस महत् कार्य के पूर्ण होने की प्रक्रिया उनके बाल्यकाल से ही प्रारंभ हो चुकी थी। यह प्रिक्रिया उनकी विविध गतिविधियों तथा उनके द्वारा विचार पूर्वक संपोषित किए आंतरिक विकास का परिणाम थी। इसमें अनेक दृश्य - अदृश्य तथा प्रत्यक्ष - अप्रत्यक्ष कारणों का योगदान था, इसलिए समय के आह्वान पर दैवी योजना की पूर्ति हेतु, सर्वश्रेष्ठ साधन के रुप में एकनाथजी चुन लिए गए। वास्तव में यह विकास व प्रगति की कहानी ही एकनाथजी के जीवन चरित्र का मुख्य आंतरिक तत्व हैं। वे साधरण परिवार में जन्मे व सर्वसाधरण सामाजिक परिवेश में पले-बढ़े थे। किंतु गहन अतर्दृष्टि तथा सूक्ष्म निरीक्षण क्षमता, अध्ययनशील तथा परिश्रमी, शारीरिक रुप से दृढ़, मानसिक रुप से सजग तथा तीक्ष्ण मेधा से युक्त, जन्मत सहज आध्यात्मिक प्रवृत्तिवाले, अटल आर्दशवादी, कष्ट तथा त्याग करने हेतु सदैव तत्पर तथा दायित्व की आवश्यकता के अनुसार प्रत्येक नवीन ज्ञान और कौशल को आत्मसात करने हेतु उत्सुक और सक्षम तथा अपने जीवन - ध्येय के प्रति पूर्णत सजग, एक महान चमू - निर्माता और एक अद् भुत संगठन तथा इसके भी परे अपने जीवन - ध्येय को पूर्ण करने की क्षमता और योग्यता पर प्रचंड विश्वास रखनेवाले, ऐसे थे, श्री एकनाथजी रानडे। इस जीवन-चित्र में, सभी तथ्यों को वर्णन के रुप में नहीं अपितु संकेतों के रुप में रखा गया है। इसका उद्देश्य प्रेरित करना है न कि जानकारी देना, कार्य हेतु प्रोत्साहित करना है न कि केवल उल्लेख करना। जैसे -जैसे यह कथा आगे बढ़ती है, एकनाथजी के उदात्त आदर्श का अनावरण तथा उनकी विचार प्रक्रिया का उद् घाटन करने का प्रयास सम्यक् रुप से किया गया है जो कि एकनाथजी के व्यक्तित्व तथा उपलब्धियों के विकास को स्पष्ट करता है। हमें पूर्ण विश्वास है कि यह संक्षिप्त संस्करण विवेकानन्द केन्द्र के उन सभी कार्यकार्याओं को एक स्थिर आधार देगा जिन्हें उनके साथ कार्य करने का परम सौभाग्य मिला था तथा उन्हें भी जो उनके बाद केन्द्र में आए। सभी कार्यकार्ताओं के लिए एकनाथजी सदैव उनके आदर्श का साकार रुप, उनके प्रेरणा - स्रोत तथा साधना व साध्य रहे हैं। यह पुस्तक जन - सामान्य के लिए तथा जिन्होंने उनके साथ कंधे - से - कंधा मिलाकर कार्य किया था, दोनों के लिए एक ऐसे व्यक्तित्व को समझने में सहायक सिद्ध होगी, जिसने राष्ट्र के मानस - पटल पर अमिट छाप छोड़ी है। ऐसे महापुरुष का स्मरण करना, यही अपने आप में फलदायी है। यह हमारे जीवन को अर्थपूर्ण बनाएगा। पी परमेश्वरन् , अध्यक्ष - विवेकानन्द केन्द्र, कन्याकुमारी
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Publication Year 2003
VRM Code 1627
Edition 3
Pages 264
Volumes 1
Format Soft Cover
Author Nivedita Raghunath Bhide
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